जो कछु प्रीति लाल की गाई। तातें अधिक कुँवरि की माई॥५४॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि प्रेम के वशीभूत प्रियतम की श्री प्रिया के प्रति जिस प्रीति एवं सेवा का ऊपर की पङ्कियों में वर्णन किया गया है, अपने आप में अनुपम एवं विलक्षण है किन्तु कुँवरि किशोरी कृष्णाराध्या श्री राधा की अपने प्रियतम लाल के प्रति जो भी अन्तः प्रीति है, वह लाल से कई गुणा अधिक एवं गम्भीर है