प्रिया-प्रेम के सिंधु में, पैरत नवल किसोर।
रहे हारि यातें तहाँ, पावत नहिं कहुँ ओर॥५५॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
प्रिया का प्रेम एक अपार और अथाह समुद्र है, जिसमें नवल-किशोर प्रियतम तैरते रहते हैं किन्तु उस प्रेम समुद्र का न तो कोई ओर-छौर पाते हैं और ना ही उसकी गम्भीरता की थाह ले पाते हैं। इसलिए सदा अपने आपको पराजित अनुभव करते रहते हैं