॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 35.55

अनुराग-लता

प्रिया-प्रेम के सिंधु में, पैरत नवल किसोर।
रहे हारि यातें तहाँ, पावत नहिं कहुँ ओर॥५५॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

प्रिया का प्रेम एक अपार और अथाह समुद्र है, जिसमें नवल-किशोर प्रियतम तैरते रहते हैं किन्तु उस प्रेम समुद्र का न तो कोई ओर-छौर पाते हैं और ना ही उसकी गम्भीरता की थाह ले पाते हैं। इसलिए सदा अपने आपको पराजित अनुभव करते रहते हैं