॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 36.53

प्रेमलता

करि सिंगार जबै दोउ निबरे। छबि सौं नव निकुंज तैं निकरे॥५३॥