॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 37.42

रसानन्द

कुंदन-दुलरी कंठ सुहाई। मनौं रूप की सींव बनाई॥४२॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

पाठान्तर -१ तजी कण्ठ पर कुन्दन की दुलरी क्या है, मानो रूप की सीमा-रेखा है