॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 37.55

रसानन्द

रति विपरित चुंबन इक संगा। करत विविध नव-केलि अनंगा॥५५॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

तत्पश्चात्‌ चुम्बन, आलिङ्गनादि रति-भावों का विस्तार करके प्रियतम को तुष्ट-पुष्ट किया