रति विपरित चुंबन इक संगा। करत विविध नव-केलि अनंगा॥५५॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
तत्पश्चात् चुम्बन, आलिङ्गनादि रति-भावों का विस्तार करके प्रियतम को तुष्ट-पुष्ट किया
रति विपरित चुंबन इक संगा। करत विविध नव-केलि अनंगा॥५५॥
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
तत्पश्चात् चुम्बन, आलिङ्गनादि रति-भावों का विस्तार करके प्रियतम को तुष्ट-पुष्ट किया