जुगल-मिलन-सुख अतिही भावै। नेह बढ़नि की बात चलावै॥६८॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
इन्हें युगल-किशोर के मिलने का सुख सहज प्रिय है, अतएव युगल से ऐसी बातें करती हैं, जिससे उनके पारस्परिक प्रेम में वृद्धि हो