॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 37.68

रसानन्द

जुगल-मिलन-सुख अतिही भावै। नेह बढ़नि की बात चलावै॥६८॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

इन्हें युगल-किशोर के मिलने का सुख सहज प्रिय है, अतएव युगल से ऐसी बातें करती हैं, जिससे उनके पारस्परिक प्रेम में वृद्धि हो