बिच-बिच मंद-मंद सुर गावै। सुनत हिये के श्रवन सिरावै॥८०॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
बीच-बीच में मन्द-मन्द गान करती हैं, जिसे सुनकर युगल के अन्तर्मन के श्रवण शीतल हो जाते हैं