॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 37.111

रसानन्द

निर्त्तत फिरत किसोर-किसोरी। मधुर वचन कहि हो-हो होरी॥१११॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

इनके बीच में युगल किशोर 'हो हो होरी' के मधुर शब्द बोलते हुए नृत्य कर रहे हैं