कठिन पीर पिय विरह की, लगे प्रेम के बान।
अब तौ चाहत है चल्यौ, रहि न सकत इहि प्रान॥५॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
प्रियतम के वियोग की पीड़ा असह्य होती है , प्रेम-वाणों से बिंध जाने के पश्चात् प्रेमी के शरीर में प्राणों का रहना कठिन हो जाता है, उसके प्राण निकलने को आतुर रहते हैं