॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 5.5

ख्याल हुल्लास

कठिन पीर पिय विरह की, लगे प्रेम के बान।
अब तौ चाहत है चल्यौ, रहि न सकत इहि प्रान॥५॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

प्रियतम के वियोग की पीड़ा असह्य होती है , प्रेम-वाणों से बिंध जाने के पश्चात्‌ प्रेमी के शरीर में प्राणों का रहना कठिन हो जाता है, उसके प्राण निकलने को आतुर रहते हैं