सहज इंदु दंपति वदन, सखियनि-नैंन चकोर।
निरखि रूप इक-टक रहे, बँधे प्रेम दृढ़ डोर॥११९॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
दम्पति के श्रीमुख सहज चन्द्र हैं और सखियों के नेत्र चकोर हैं, जो एकटक रूप का अवलोकन प्रेम की डोर से बँॅधे हुए करते रहते हैं