जेतिक अंग सुधंग के, अरु संगीत प्रमान।
औरैं विधि निर्त्तत नवल, नवल-नवल सुर गान॥१४७॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
नृत्य-कला के सुधङ्ग आदि जितने भी अङ्ग हैं और सङ्लीत-शास्त्रों में जो प्रामाणिक सङ्लीत हैं, विविध राग-रागिनियाँ हैं, उन सब के स्वरूप को निरस्त कर के युगल नवल कुछ नवीन प्रकार से नव-नव भाँति के स्वर-गान कर रहे हैं, एवँ नृत्य कर रहे हैं