यह सुख तौ नैंना ही जानैं। रसना हित ध्रुव कहा बखानैं॥१५४॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि इस सुख को तो केवल नेत्र ही जानते हैं । बेचारी जिल्ला क्या वर्णन करे