सघन कुंज इक हुती सुहाई। बैठे लाल तहाँ अरगाई॥२५॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
साक्षात् प्रथम-दर्शन चौपाई एक समय की बात है कि वे सङ्केत वट के सघन वन की किसी सुहावनी कुञ्ज में चुपचाप जा बैठे