॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 38.25

ब्रज-लीला

सघन कुंज इक हुती सुहाई। बैठे लाल तहाँ अरगाई॥२५॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

साक्षात्‌ प्रथम-दर्शन चौपाई एक समय की बात है कि वे सङ्केत वट के सघन वन की किसी सुहावनी कुञ्ज में चुपचाप जा बैठे