अनत अटक नाहिंन भली, यह समुझै सब कोइ।
लहै न मन कौं जो रुचै, फिरि फिरि दुख ही होइ॥१६॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
संसार में जहाँ-जहाँ मन आसक्त होता है, वहीं-वहीं दुख का मूल है और सर्वाधिक खेद का विषय तो यह है कि जहाँ सर्वदा सुख ही सुख है , उस प्रेमरस माधुरी में अज्ञानी अटकता नहीं १५॥“ उद्बोधन दोहा यह बात सर्व-विदित है कि भगवत् प्रेम के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं चित्त लगाना हितकर नहीं है और अन्यत्र चित्त लगाने पर भी उसका रुचिकर विषय उसे अप्राप्त ही रहता है, फलतः बारम्बार दुःख ही देता है