प्रेम की बात निपट अटपटी। सोई जानै जेहि लगै चटपटी॥७२॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
अस्तु, श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि प्रेमानुभूति का व्याख्यान कर सकना अत्यन्त जटिल प्रसङ्ग है। इसे वर्णन के द्वारा नहीं समझाया जा सकता । प्रेम अनुभव-गम्य होता है