॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 38.83

ब्रज-लीला

प्रेम-विवस कछुवै न सुहाई। मोहन-मूरति हृदै बसाई॥८३॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

उनको प्रियतम के सिवाय अन्य कुछ भी अच्छा नहीं लगता था । उनके हृदय में प्रियतम की मन-मोहनी छबि बसी हुई थी