॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 38.122

ब्रज-लीला

अब तो जतन करौ वर नारी। मिलै मोहि वृषभानु-दुलारी॥१२२॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

चौपाई दोहा चौपाई हे ललिते ! तुम समस्त सखियों में परम चतुर एवं श्रेष्ठ हो, अब तुम यह प्रयत्न करो, जिससे मैं श्री वृषभानुदुलारी का दर्शन प्राप्त कर सकूँ