अब तो जतन करौ वर नारी। मिलै मोहि वृषभानु-दुलारी॥१२२॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
चौपाई दोहा चौपाई हे ललिते ! तुम समस्त सखियों में परम चतुर एवं श्रेष्ठ हो, अब तुम यह प्रयत्न करो, जिससे मैं श्री वृषभानुदुलारी का दर्शन प्राप्त कर सकूँ