अति आनंद बढ़्यौ मन माँहीं। बैठे जाइ निकुंजनि छाँहीं॥१३९॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
इसलिए आप शीघ्रतापूर्वक इन्हें वस्त्राभूषणों से सुसज्जित करके अभी इसी क्षण मेरे साथ भेज दीजिये । १३७॥सखी की बात सुनकर नन्दरानी यशोदा बहुत प्रसन्न हुईं और उन्होंने बड़े उत्साह से अपने नवल लाल को नवीन-नवीन वस्त्राभूषणों से सुसज्जित करके सखी के साथ भेज दिया । १३८॥नन्दग्राम से चलकर नन्द-नन्दन एवं सखी आनन्दित मन से एक निकुञ्ज की छाया में आ बैठे