उपजी बात एक मन माँहीं। सकुचत हैं पिय कहि न सकाँहीं॥७॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
उस समय नवल-किशोरी प्रिया की आनन्द-पुलकित छवि का अवलोकन करके प्रियतम के मन में एक अभिलाषा उत्पन्न हुई, किन्तु वे सङ्कोचवश उस अभिलाषा को ७२९ नृत्य-कला का प्रकाश चौपाई दोहा कह नहीं पाये