स्रवत द्रुमनि तें रस की धारा। आनँद प्रेम कियौ विस्तारा॥३१॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्रीप्रिया-मुख-निःसृत सुकोमल सरस वाणी-गान का श्रवण करके श्री वन की हरिणी एवं भ्रमरी तो थकित हो ही गर्यी, वायु भी थक गया, उसकी गति अवरुद्ध हो गयी एवं श्री यमुना का जल-प्रवाह भी स्तम्भित हो गया । 1३०॥आनन्द एवं प्रेम का कुछ ऐसा विस्तार हुआ कि वृन्दावन के वृक्षों से रस-धारा स्रवित होने लगी