लाल विवस सहचरि सबै, मोरी मृगी बिहंग।
गावति रस में नागरी, नव-नव तान तरंग॥
नव-नव तान तरंग, सप्त सुर सौं मन हरही।
ऐसी को सखि आहि, सुनत जो धीरज धरही॥
नव-नव गुन की सींव सब, अति प्रवीन वर बाल।
नागर-कुल-मनि तैसेई, स्रोता सुदंर लाल॥३४॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्रीप्रिया द्वारा गाये गए रागों की अनुरागपूर्ण सुमधुर ध्वनि का श्रवण करके वेणुसम्राट रसिक लाल जी भी मोहित हो गये । उनके हृदय में नवल बाला के संगीत का मर्म-स्पर्शी बाण बिंध गया, जिससे हे सखि ! वे धैर्य धारण करने में असमर्थ हो गए ।1३३॥श्री लाल तो विवश हुए ही, सभी सहचरियाँ भी विवश हो गईं । यहाँ तक कि रसमयी नागरी प्रिया की नयी-नयी तान-तरङ्गों से श्री वन की मयूरी, मृगी एवं अन्य पक्षी-गण भी रस-विवश हो गए । इन नयी-नयी तान-तरङ्गों के सप्त-स्वरों ने जड़-चेतन सभी का मन हरण कर लिया । हे सखि ! तब ऐसा कौन है, जो धैर्य-धारण ` पूर्वक अपने आप को सँभाले रखे । श्री किशोरी जू नित्य-नूतन गुणमयी कलाओं की चरम-सीमा हैं । अपने परिकर की सहचरियों में अतिशय निपुण हैं और उनके अनुपम सङ्गीत के श्रोता परम सुन्दर श्री लाल जी भी सङ्गीत-निपुण समाज के मुकटमणि हैं