भक्ति-छत्र जिहि सिर फिरै, ताकौ राज प्रमान।
कर्म-धर्म किंकर भये, सेवत रहैं सुजान॥३१॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
कवित्त , दोहा दान, धर्म श्रेयस्कर हैं, इस विश्वास से कोई सुमेरु तुल्य स्वर्ण-राशि का दान करे, मणि-माणिक, रत्नों के दान, गज-दान, अन्नदान और भूमिदान तथा मुक्ताराशि से अनेक तुलादान करे, प्रयाग जैसे तीर्थ में स्नान और काशी में जाकर ग्रहण के अवसर पर चित्त-शुद्धि के निमित्त बहुत दान करे, शय्यादान, कन्यादान भी करे एवं कुरुक्षेत्र में जाकर शुभ पर्व पर गो-दान करे, तो भी इन सारे दानों के पश्चात् भी वह सर्वथा पाप-मुक्त नहीं हो पाता। श्री हित भ्रुवदास जी कहते हैं कि श्री कृष्ण-केसरी का नाम एक बार लेने मात्र से त्रैलोक्य के सारे पापी एक क्षण में संसारी आवागमन से छूट कर परम-गति के अधिकारी हो जाते हैं ।३०॥जिसके सिर पर भक्ति रूपी छत्र तना हो, वही सब धर्मो का राजा है, ऐसा मानना चाहिये । कर्म-धर्मादि सभी उस भक्ति रूपी राजाधिराज के दास हैं, जो अपने सम्राट् की सेवा किया करते हैं