बिचल्यौ फिरै भली नहीं, प्रेम गली छुटि जाइ।
रहै एक ही ठौर लगि, जुगल चरन चित लाइ॥४४॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
ज्ञान-कर्म प्रधान आचार-धर्मो में भटकना श्रेयस्कर नहीं है; क्योंकि इस भटकन से उपासक प्रेम-पथ से च्युत हो जाता है; अतएव एकमात्र श्री युगल चरणों में ही चित्त को स्थिर कर देना चाहिये