॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 5.44

ख्याल हुल्लास

बिचल्यौ फिरै भली नहीं, प्रेम गली छुटि जाइ।
रहै एक ही ठौर लगि, जुगल चरन चित लाइ॥४४॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

ज्ञान-कर्म प्रधान आचार-धर्मो में भटकना श्रेयस्कर नहीं है; क्योंकि इस भटकन से उपासक प्रेम-पथ से च्युत हो जाता है; अतएव एकमात्र श्री युगल चरणों में ही चित्त को स्थिर कर देना चाहिये