राग नट
देखि पिय-नैंन भरे आनंद।
प्रिया बदन अंबुज तें पीवत, मनौं मधुप मकरंद॥१॥
रहित-निमेष इक टक ह्वै चितवत, इंदु सहज छबि ओर।
करत पान रस सुधा माधुरी, मानौं उभय चकोर॥२॥
इहि विधि मुदित प्रेम रस भीने, छिन-छिन रुचि उपजात।
“हित ध्रुव' मानहुँ रूप स्वाति जल, चातक चख न अघात॥३॥