॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 28

पद्यावली

राग नट

देखि पिय-नैंन भरे आनंद।
प्रिया बदन अंबुज तें पीवत, मनौं मधुप मकरंद॥१॥
रहित-निमेष इक टक ह्वै चितवत, इंदु सहज छबि ओर।
करत पान रस सुधा माधुरी, मानौं उभय चकोर॥२॥
इहि विधि मुदित प्रेम रस भीने, छिन-छिन रुचि उपजात।
“हित ध्रुव' मानहुँ रूप स्वाति जल, चातक चख न अघात॥३॥