॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 6.6

भक्त-नामावली

पति, कुटुंब देखत सबै, घूँघट-पट दिये डारि।
देह गेह बिसर्यौ तिनहिं, (श्री) मोहन रूप निहारि॥६॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

श्री मोहनचन्द्र का रूप-दर्शन करते ही नारियों ने देह-गेह की विस्मृति पूर्वक पति एवं कुटुम्बादि की परवाह किये बिना अपनी लज्जा का परित्याग कर दिया था