पति, कुटुंब देखत सबै, घूँघट-पट दिये डारि।
देह गेह बिसर्यौ तिनहिं, (श्री) मोहन रूप निहारि॥६॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्री मोहनचन्द्र का रूप-दर्शन करते ही नारियों ने देह-गेह की विस्मृति पूर्वक पति एवं कुटुम्बादि की परवाह किये बिना अपनी लज्जा का परित्याग कर दिया था