राग-भोग अद्भुत विविध, जो चहिये जिहि काल।
दिनहिं लड़ाये हेत सौं गिरधर श्री गोपाल॥१६॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
उत्तमोत्तम प्रकार के विविध व्यञ्जन एवं राग-भोग जब जैसे और जिस समय अर्पित करने चाहिये, वह सब उन्होंने किये और इस प्रकार अपने आराध्य श्री गिरिधर गोपाल को जीवन पर्यन्त बड़े प्रेम से दुलराया