विष समान तजि विषै-सुख, देस सहित परिवार।
वृंदावन कौं यौं चले ज्यौं सावन जल-धार॥२०॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
जब श्री रूप एवं सनातन जी के मन में श्री राधा-कृष्ण के अनुराग की वृद्धि हुई एवं संसार की विनश्वरता की प्रतीति हुई, तब उनको संसार से निर्वेद (वैराग्य) हुआ ।1१९॥उन्होंने सांसारिक सुख-भोग, जन्म-भूमि, परिवार एवं समस्त धन-धान्य को विषवत् त्याग दिया और वेगवती श्रावण-सरिता की भाँति वृन्दावन के लिए चल दिये