सूरदास अति प्रीति सौं, कवित रीति भल कीन।
मदन-मोहन अपनाइ कैं, अंगीकृत करि लीन॥९७॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
१. जसवंत जी-गोस्वामी श्री हित हरिवंश जी के शिष्य, राठौर क्षत्रिय, सन्त-सेवी । ( देखिये-भक्तमाल नाभा स्वामी कृत छप्पय संख्या १५५, देखिये-रसिक अनन्य माल श्री भगवत मुदित कृत) २. भूपति गोविन्द दास-हरीदास तूमर के छोटे भ्राता, राधावल्लभीय वैष्णव । (देखिये-भक्तमाल नाभा स्वामी कृत टीका हरीदास तूमर की) ३. श्री हरिदास तूमर-काशी निवासी, श्री हित हरिवंश जी महाराज के शिष्य सन्त सेवी । (देखिये-भक्तमाल नाभा स्वामी कृत, छप्पय संख्या १७९ तथा देखिये. रसिक अनन्य माल हरीदास की परचई) ४. स्वामी परमानंद दास एवं सूरदास-श्रीमद् वल्लभाचार्य जी के शिष्य, अष्टछाप के महाकवि । (देखिये-मक्तमाल नाभा स्वामी कृत छप्पय संख्या ७३ एवं ७४) रसि% भक्त श्री मदन मोहन सूरदास जी (सूरध्वज) ने अतिशय प्रीति पूर्वक श्रेष्ठ भक्ति-काव्य की रचना की । इनको ठाकुर श्री मदन मोहन महाराज ने अपनाकर परिकर में अङ्गीकार कर लिया