एक समै भृगु पिता सौं, प्रश्न करी यह आनि।
करि प्रनाम ठाढ़ौ भयौ, आगैं जोरे पानि॥२॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
एक समय ब्रह्मा जी के सुपुत्र महर्षि भृगु अपने पिता जी के सम्मुख आ उपस्थित हुए एवं प्रणाम करके कर-बद्ध भाव से उनसे पूछने लगे