एक असंका उर बढ़ी, चित्त रह्यौ विस्माइ।
सर्वोपरि सर्वग्य तुम, हमहिं देहु समुझाइ॥३॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
पिताजी मेरे मन में एक आशङ्का प्रवल रूप से जागृत है और उसके कारण मेरा चित्त विस्मित (विभ्रमित) है । आप सर्वोपरि सर्वज्ञ हैं । आप समस्त ज्ञान के धारक हैं