यह अष्टक ‘ध्रुव’ पढ़ै जौ, संध्या और सबार।
ताके हियैं प्रकास रहै, मिटै त्रिगुन-अँधियार॥९॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्रीधुवदासजी कहते हैं कि जो कोई संध्या एवं प्रात--काल इस “आनन्दाष्टक का पाठ करेगा, उसके हृदय में त्रिगुण जन्य अन्धकार का विनाश होकर सदा प्रेम का प्रकाश प्रकट होगा