नारी किंवा पुरुष हो, जिनिकै मन इह भाव।
दिन-दिन तिनकी चरन-रज, लै-लै मस्तक लाव॥६॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि इस प्रकार के सेवानुरागी, चाहे वे नारी शरीर किंवा पुरुष शरीरघारी हों, सभी वन्दनीय हैं। उनकी चरण-रज सदैव शिरोधार्य करनी चाहिये