॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 13.6

भजन-शत

नारी किंवा पुरुष हो, जिनिकै मन इह भाव।
दिन-दिन तिनकी चरन-रज, लै-लै मस्तक लाव॥६॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि इस प्रकार के सेवानुरागी, चाहे वे नारी शरीर किंवा पुरुष शरीरघारी हों, सभी वन्दनीय हैं। उनकी चरण-रज सदैव शिरोधार्य करनी चाहिये