लाल-लड़ैंती केलि कल, अद्भुत प्रेम-विलास।
तिनहीं के रँग रँगि रहै, सब ते होइ उदास॥८॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
बाह्य जगत से उपराम होकर कल केलिमय लाड़िली-लाल के प्रेम-विलास के चिन्तन में मन को रसान्वित करे