॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 13.8

भजन-शत

लाल-लड़ैंती केलि कल, अद्भुत प्रेम-विलास।
तिनहीं के रँग रँगि रहै, सब ते होइ उदास॥८॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

बाह्य जगत से उपराम होकर कल केलिमय लाड़िली-लाल के प्रेम-विलास के चिन्तन में मन को रसान्वित करे