ज्यौं-ज्यौं तन अति जीरन भयौ। त्यौं-त्यौं लोभ रोग बढ़ि गयौ॥२६॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
देखिये यह मेरा शरीर जितना-जितना जर्जर याने बूढ़ा हो रहा है, उतना-उतना ही लोभ रूपी रोग बढ़ता जा रहा है