॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 2.26

वैद्यक-ज्ञान

ज्यौं-ज्यौं तन अति जीरन भयौ। त्यौं-त्यौं लोभ रोग बढ़ि गयौ॥२६॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

देखिये यह मेरा शरीर जितना-जितना जर्जर याने बूढ़ा हो रहा है, उतना-उतना ही लोभ रूपी रोग बढ़ता जा रहा है