मन गति चंचल सबनि तें, उपजत छिन सतरंग।
आवत तबहीं हाथ जौ, रसिकनि कौ होइ संग॥२५॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
रसिक-सङ्ग की महिमा दोहा सोरठा यह मन अत्यन्त चपल है, इसमें प्रतिक्षण अनेक सङ्कल्प-विकल्पों का सृजन होता रहता है। इसको वशवर्ती करने का एक ही उपाय है कि प्रेमी, रसिक-भक्तों का सङ्ग करे