(श्री) राधावल्लभ लाल-जस, जिहि उर नाहिं सुहात।
देखौ ते नर मंद-मति, करत आप अपघात॥४१॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्री राधावल्लभ लाल का सरस यश-रस जिसे प्रिय नहीं लगता, वह मन्द-बुद्धि मनुष्य ही आत्मघाती है