॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 13.41

भजन-शत

(श्री) राधावल्लभ लाल-जस, जिहि उर नाहिं सुहात।
देखौ ते नर मंद-मति, करत आप अपघात॥४१॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

श्री राधावल्लभ लाल का सरस यश-रस जिसे प्रिय नहीं लगता, वह मन्द-बुद्धि मनुष्य ही आत्मघाती है