॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 13.56

भजन-शत

सो दिन कबहूँ आइहै, मन दुर्वासना जाहिं।
सरस चित्त अहनिस फिरौं, सघन विपिन के माहिं॥५६॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

क्या जीवन में कभी वह शुभ दिन भी आयेगा, जब मनोगत दुर्वासनाओं का“ ,नाश हो कर मैं अहर्निश सरस चित्त से रस घन वृन्दाविपिन में विचरण करता होऊँगा