॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 13.75

भजन-शत

जे नर निंदत मंद-मति, वृंदावन कौ बास।
सुपनेहुँ परस न कीजियै, तजि 'ध्रुव' तिनकौ पास॥७५॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

जिस अलौकिक प्रेम धाम वृन्दावन में श्री प्रिया-लाल की सरस प्रेम-केलि नित्य सम्पादित है, उस वृन्दावन के अतिरिक्त अन्य कुछ चित्त में नहीं लाना चाहिये॥७४ । श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि जो बुद्धिहीन व्यक्ति बृन्दावन-वास की निन्दा करते हैं, उनकी समीपता तो त्याग ही देनी चाहिये; क्योंकि वे स्पर्श के योग्य भी नहीं है