जे नर निंदत मंद-मति, वृंदावन कौ बास।
सुपनेहुँ परस न कीजियै, तजि 'ध्रुव' तिनकौ पास॥७५॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
जिस अलौकिक प्रेम धाम वृन्दावन में श्री प्रिया-लाल की सरस प्रेम-केलि नित्य सम्पादित है, उस वृन्दावन के अतिरिक्त अन्य कुछ चित्त में नहीं लाना चाहिये॥७४ । श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि जो बुद्धिहीन व्यक्ति बृन्दावन-वास की निन्दा करते हैं, उनकी समीपता तो त्याग ही देनी चाहिये; क्योंकि वे स्पर्श के योग्य भी नहीं है