॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 13.82

भजन-शत

बिन अर्पे जे जो कछू, ते लागत हैं खान।
देखौ तिहि अपराध कौ, कहँ लगि कहौं प्रमान॥८२॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

प्रभु को समर्पित किये बिना जो कुछ मिले, वह सब खा-पी लेना बहुत भारी अपराध है, इसके सम्बन्ध में जो कुछ कहा जाय, थोड़ा है