बिन अर्पे जे जो कछू, ते लागत हैं खान।
देखौ तिहि अपराध कौ, कहँ लगि कहौं प्रमान॥८२॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
प्रभु को समर्पित किये बिना जो कुछ मिले, वह सब खा-पी लेना बहुत भारी अपराध है, इसके सम्बन्ध में जो कुछ कहा जाय, थोड़ा है