भूलिहुँ मन दीजे नहीं, भक्तनि-निंदा ओर।
होत अधिक अपराध यह, यौं मत जानहु थोर॥९८॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
अतएव, भूलकर भी कभी भक्तों की निन्दा में रुचि नहीं लेनी चाहिये । यह बहुत बड़ा अपराध है, ऐसा जानना चाहिये