॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 14.14

शृङ्गार-शत — प्रथम श्रृङ्खला

सारी हरी ने हर्यौ मन लाल कौ, मोहनी सोहनी के तन सोहै।
अंगिया लाल सुरंग बनी लहि, गातहि रंग खरौ मन मोहै॥
रूप की रासि सबै गुन आगरि, या छबि की उपमा कहौ कोहै।
राजति है 'ध्रुव' कुंज बिहारिनि, सो छबि लाल पलौ पल जोहै॥१४॥