हँसनि में फूलनि की चाहनि में अमृत की,
नख-सिख रूप ही की बरषा सी होति है।
केसनि की चंद्रिका सुहाग अनुराग घटा,
दामिनी की लसनि दसन ही की दोति है॥
'हित ध्रुव” पानिप तरंग-रस छलकत,
ताकी मानौं सहज सिंगार सीवाँ पोति है।
अति अलबेली प्रिये भूषित भूषन बिनु,
छिन-छिन औरे और बदन की जोति है॥१५॥