॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 14.15

शृङ्गार-शत — प्रथम श्रृङ्खला

हँसनि में फूलनि की चाहनि में अमृत की,
नख-सिख रूप ही की बरषा सी होति है।
केसनि की चंद्रिका सुहाग अनुराग घटा,
दामिनी की लसनि दसन ही की दोति है॥
'हित ध्रुव” पानिप तरंग-रस छलकत,
ताकी मानौं सहज सिंगार सीवाँ पोति है।
अति अलबेली प्रिये भूषित भूषन बिनु,
छिन-छिन औरे और बदन की जोति है॥१५॥