॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 2.41

वैद्यक-ज्ञान

अब मैं सरन गही है तेरी। तोहिं लाज सब बात की मेरी॥४१॥

अर्थ / व्याख्या

भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)

आप सर्वज्ञ और सर्वविध समर्थ हैं । मैंने आपकी शरण ग्रहण की है, मेरी लज्जा रखना आपके हाथ है