अब मैं सरन गही है तेरी। तोहिं लाज सब बात की मेरी॥४१॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
आप सर्वज्ञ और सर्वविध समर्थ हैं । मैंने आपकी शरण ग्रहण की है, मेरी लज्जा रखना आपके हाथ है