॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 14.13

शृङ्गार-शत — द्वितीय श्रृङ्खला

फूलनि की कुंज ऐंन फूलनि की रची सैंन,
फूलनि के भूषन बसन फूल मन में।
फूल ही की चितवनि मुसिकनि फूलही की,
फूलि-फूलि लपटात फूल के सदन में॥
फूलनि के हाव-भाव फूलनि कौ बढ्यौ चाव,
फूले फूल देखि 'ध्रुव' उभै तन-वन में।
बरसत सुख-फूल सुरत हिंडोरे झूल,
फूल ही की दामिनी लसत फूल घन में॥१३॥