नवल रसिक पिय एक मन एक हिय,
एकै बात है सुहाति दुहुँनि के मन कौं।
एक वैस एक जोर एक से भूषन पट,
एक सी छबीली छबि राजति है तन कौं॥
रूप ही के रंग भीने लोचन चकोर कीन्हें,
एकै संग चाहैं ऐसैं जैसैं मीन वन कौं।
‘हित ध्रुव’ रसिक सिरोमनि जुगल बिनु,
आली को निवाहै एक रस प्रेम पन कौं॥४०॥