॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 14.40

शृङ्गार-शत — द्वितीय श्रृङ्खला

नवल रसिक पिय एक मन एक हिय,
एकै बात है सुहाति दुहुँनि के मन कौं।
एक वैस एक जोर एक से भूषन पट,
एक सी छबीली छबि राजति है तन कौं॥
रूप ही के रंग भीने लोचन चकोर कीन्हें,
एकै संग चाहैं ऐसैं जैसैं मीन वन कौं।
‘हित ध्रुव’ रसिक सिरोमनि जुगल बिनु,
आली को निवाहै एक रस प्रेम पन कौं॥४०॥