छुवत न रसिक रँगीलौ लाल प्यारी जू कौं,
मनहूँ के करन सौं छुवत डरत हैं।
प्रेम की नौलासी प्यारी सहज ही सुकुमारी,
प्राननिं की छाया तिन ऊपर करत हैं॥
नेकु ही कौ हास सखी सार है बिलासनि कौ,
जाके हेरैं और सब सुख बिसरत हैं।
अतिही आसक्त ताकी ‘हित ध्रुव’ यहै गति,
रीझि-रीझि दूरि ही तें पाँइनि परत हैं॥४३॥