भोर भयैं साँझ ही कौ धोखौ है दुहुँनि मन,
सुपनौ सो चेत कहैं कहा बात है भई।
ऐंकि हम मिले नाहिं बैठे हैं अबहिं आइ,
ऐंकि निसा आज कछु बीच ही तें ह्वै गई॥
भूषन बसन छूटे देखैं पुनि समुझत,
कौन एक भ्रम दसा उपजी है सुखमई।
‘हित ध्रुव’ यहै जानैं मिल्यौ अनमिल्यौ मानैं,
नैननिं में रुचि ही की प्रेम-बेलि है बई॥११॥