प्यारी जू की उनहार पिय कै अहार यहै,
हियहू कौ हार छिन चित तें न टारहीं।
अंग की सुवास पर भ्रमत भँवर मन,
लोचन छबीली जू की छबि ही निहारहीं॥
पल-पल पानिप तरंग-रंग औरै-और,
माधुरी सुभाइनि की अमित अपारहीं।
‘हित ध्रुव’ प्रेम-रस-बिवस रहत दिन,
चितै-चितै मुख ओर प्राननि कौं वारहीं॥४१॥