॥ श्री राधावल्लभो जयति ॥ श्री हित हरिवंश चन्द्रो जयति ॥
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श्री हित बयालीस लीला — छंद 14.41

शृङ्गार-शत — तृतीय श्रृङ्खला

प्यारी जू की उनहार पिय कै अहार यहै,
हियहू कौ हार छिन चित तें न टारहीं।
अंग की सुवास पर भ्रमत भँवर मन,
लोचन छबीली जू की छबि ही निहारहीं॥
पल-पल पानिप तरंग-रंग औरै-और,
माधुरी सुभाइनि की अमित अपारहीं।
‘हित ध्रुव’ प्रेम-रस-बिवस रहत दिन,
चितै-चितै मुख ओर प्राननि कौं वारहीं॥४१॥