आज की छबीली छबि-छटा चित बेधि रही,
कही नहीं जाति कछू औरै गति भई है।
नवल युगल-हास चितवति ठाढ़ी पास,
मानौं तेहि ओर नई नेह-बेलि बई है॥
‘हित ध्रुव’ नीरज से नीर भरे ढरैं नैन,
बोलति न कछू बैंन चित्र सी ह्वै गई है।
नैंना छाइ लीन्हें रूप परी तब प्रेम कूप,
बाकी गति जानै सोई जेहि अनभई है॥४२॥