निरखि अरुन बैंदी छबिहि, मति की गति भई मूक।
मानौं विधु पूज्यौ सखिनु, आनि फूल बंधूक॥११॥
अर्थ / व्याख्या
भावार्थ (स्वामी श्री हितदास जी — पुस्तक की टीका, स्कैन से; छोटी त्रुटियाँ सम्भव)
श्री किशोरी के ललाट-पटल पर लाल रङ्ग की बिंदी की छबि देख कर बुद्धि विस्मित रह जाती है, ऐसा प्रतीत होता है मानो सखियों ने बन्धूक पुष्प से चन्द्रमा का पूजन किया हो